बुरा वक्त हैं या बुरे हम हैं?

आँखो की पंखुडियाँ आज कुछ नम हैं,

दिल की आवाज़ आज कहीं गुम हैं,

बातों के सिलसिले भी आज कुछ कम हैं,

वक्त की जंजीरो में आज बंधे हम हैं,

पता नहीं गलती किसकी हैं,

बुरा वक्त हैं या बुरे हम हैं?

© विवा

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आठवण…

​ती येते, ती छळते,
काहूर माजवते,

मनाच्या पटलावर,

कधी डोळ्यांत पाणी,

अन् भावनांध गाणी,

सूर तीचे उमटती आवेगाने,

मग अश्रू तरळती वेगाने,

अमर्याद, विस्तीर्ण अशी ती,

सांगे डोळ्यांस नजर भेदाया,

अ ते अतः पर्यंत,

जिथे फक्त तीच दिसे,

शब्द ही होती परके,

जेंव्हा जेंव्हा येते ती,

शब्दसूरांच्या मैफीलीत रंगणारी,

प्रितीची ती शाल जणू,

अन् किनार लांब तिजला,

शब्दांच्या नाजूक माळांची,

मोहरणाऱ्या या मनावर,

ती एक कवडसा जणू,

सोनेरी किरणांचा,

धारधार पिवळ्या रेषांचा,

कधी हवीहवीशी,

कधी भयप्रद, भयानक,

कधी शब्दांचे गंध टिपते,

कधी कवेत घेते,

कधी भ्रमाला चपराक,

अन् कधी शस्त्राची धार,

शुभ्र फुलांचा सुगंध जणू,

कधी असते उध्वस्त,

कधी असते उजळणी,

आयुष्यात मरेपर्यंत ती साथ देते,

चांगले वाईट अनुभव देते,

लोकांची पारख देते,

स्वतः ची ओळख देते

कधी डोळ्यांतून वाहते,

कधी मंद मंद हसते,

अन् गालावरच्या या खळीला,

हसण्याचे कारण देते,

ती एक आठवण,

मनातली साठवण,

अन् अचानक सुचते,

ही कविता.. ती एक आठवण…


विवा ©

You know what?

​You know what?

जब पहली बार हम मिले थे..

हमारी बातों में कुछ गिले थे,

शिकवे भी थे लेकिन कम थें..

जिन्हें हमने कॉफी के हर एक सिप के साथ आजमाया था…


You know what?

जुलै से सितंबर तक जागी वो रातें,

हमारी काफी सारी अधूरी बातें,

कुछ प्यार भरी बातों में कटनेवाली वे आधी रातें

दिल में खयाल लाती हैं सिर्फ, की चाहत होती क्या हैं…


You know what?

तेरी बातों से मिलनेवाले तानें,

तेरे-मेरे कुछ एक से, पर अनसुने गानें,

तेरी बातों का वह खुमार,

और मेरा हद से जादा तुझपे प्यार,

एहसास दिलता हैं की बस यही एक कश्ती हैं, जिसमें गोत लगाऊँ…


You know what?

जब भी तुम बात करती हो, लगता हैं तुम्हें सुनता रहूँ उम्रभर,

मोहोब्बत का दिया बस यूँ ही जलता रहें उम्रभर,

लगता हैं की जिऊं भी तो तुम्हारे खातिर और मरू भी तो सिर्फ तुम्हारे वास्ते,

क्योंकी इस प्यार की कोई सरहद नहीं हैं, जिन्हें तुमने खुद के मन में बढावा दिया हैं…



You know what?

जब भी तुम्हारा कोई मेसेज आता हैं दिल फूल सा खिल जाता हैं,

जब नहीं आता कोई जवाब तो दिल खुद पे नाराज और उतावला उस मेसेज के लिये हो जाता हैं… जिन्हें पढने की अब आदत सी लगी हैं…


You know what?

जब भी फोन की बीप बजती हैं, दिल कहता हैं शायद तुम्हारा ही कोई मेसेज हो..

लेकिन जब नजरें स्क्रीन पर गड जाती हैं तो बडा़ ही अजीब सा महसूस होता हैं…

बडा़ ही प्यारा रिश्ता बना हैं तुम्हारा मेरे दिल में, रात में नींद आती नहीं, सुबह से दिन कटता नहीं… खुशी भरा…


You know what?

तेरे तानों से भी मुझे बेशुमार प्यार हैं,

दिल के जज्बात कहते हैं मेरे, बस प्यार ही तो हैं,

ना शिकायत हैं ना ही कोई उलझन,

ना कोई रूसवाई हैं ना ही कोई सुलझन,

तेरे दिल में चलनेवाली ‘डर’ की कुरबतें ही तो हैं, जो बीच में तेरे मन में आतंक फैला रहीं हैं…


You know what?

तेरे मेरे बीते दिनों की कुछ सुरवटें, जो अब तक कुछ हद तक ताजा हैं, जिन्हें हम भूतकाल में कथित करते हैं..

क्यों न हम मिलके उन्हें भूलाकर इक नई उम्मीद की किरणों को रोशन करें?

कुछ तेरे भी, कुछ मेरे भी दरमीयाँ कुछ चुनौतीयाँ हैं,

आ मिलकर हम दोनों उन्हें इस तरह झेलें, जिससे सारा माहौल कुछ सिमट सा जायें…


You know what?

वह रात-दिन दिल में चलनेवाला सैलाब,

चाहतों की रंझीशों में मनमाफीक चलनेवाले रंगीन ख्वाब,

उन ख्वाबों की बस एक ही राणी तू और मैं राजा,

दिल में हलचल मचाता हैं प्यार, सिर्फ एक बार आजा.. कुछ कदम दूर हम यूँ ही चले हमसफर के रास्ते, आ बस चलते ही रहें और लोग हमें तांकते रहें…


You know what?

कितनी मोहब्बत की हैं मैंने?

सपने हैं बुने कुछ इस तरह, जोे अपने लगे हैं,

जिन्हें बेपनाह चाहा हैं उस सलिके से, जो सदा बरकरार रहें..

जीन्हें साथ साथ जीने की ख्वाईशें हैं, हिदायतें मंजील को पार करने की हैं…


You know what?

कुछ यादें बुनी हैं हमने मिलकर, जिन्हें मिटा पाना मुश्किल नहीं नामुम्कीन हैं..

जो पल दो पल बितायें हैं, क्या तुम उन्हें भुला पाओगी?

चलो मान लिया तुम मेरी न बन पाओं, नसीब किसने जाना हैं? शायद तुम मेरी ही हो जाओगी…

क्यों यह बिनमुनाफे की जज्बातों पर जोर डालें हम?

चलो मिलकर कुछ अच्छा ही सोचें हम…


You know what?

लमहें हैं कुछ कश्मकश और गुस्ताखी दिलों में जारी हैं,

जो तु चाहे वह मैं ना मानू, जो मैं चाहू वह तू ना मानें,

आ मिलकर मिटायें यह दूरियाँ और कुरबतें उस अनचाहे डर की,

जिससे कईं जादा हैं अपनी कमीयों को ढालें और  गुनगुनायें कुछ गीत खुशी के…

जिन्हें कविताओं में सजाया था, सिर्फ तेरे लिये…


You know what?

जब दिल में खुशीयाँ मचल रही थीं, जब हमारी बातें बस शुरू ही हुईं थी..

लापता थी यह डर की परछाईंया, जो तुमने दिल में पाली थी..

कब तक सँवारें हम इस ‘भूतकाल’ को, जिसका आगे कोई मोल ही ना हो?

बस साथ चाहा हैं तुम्हारा, न मैंने तुमसे तुमको छीना हैं,

गुस्ताखीयों की भी सजा कुछ महफूज रहती हैं, प्यार की जंजीरों में बंधी सी रहती हैं..

बस तुम भी आगे आओ, कुछ मैं भी आऊँ..


You know what?

मैं एक कदम आऊं, तो तुम दो कदम पिछे हटती हो,

क्यों इस चॉइस के जाल में उमडी़ पडी हों, जिसका कोई भरोसा ही ना हों…

हर इक मोहरा एक जैसा नहीं होता, यह जवैरी ही बतलायेगा..

आज नहीं तो कल, वह दिन जरूर आयेगा… जब तुम और मैं “हम” होंगे और जहाँ खुशियाँ मनायेगा…


You know what?

दिलों की नादानी अब मिट जायेगी, शायद ही ऐसा यह दौर हैं..

कुछ तू बोल, कुछ मैं बोलूं, बस ऐसी चुप न रहा कर..

शायद ही तेरी यह चुप्पी, मेरे इस दुनियाँ से चल बसने की दस्तक दें…

इस खामोशी की तडप में भले ही प्यार छीपा हो, बस प्यार को तो इज्जत दें…


You know what?

जब रब ने हमको मिलाया होगा, कुछ न कुछ तो उसने भी चाहा होगा…

प्यार एक सा हो जायें और चल पडे हम अपने रास्तें,

ऐसा कुछ पैगाम तो लाया होगा?

चलो पढ लें कुछ पन्ने उस पैगाम के और बढ चलें कुछ नयें ख्वाब बुनने… जो मैंने हम दोनों कि एक ही नजर से देखें हैं…


You know what?

जब तुम ऐसी खामोश रहती हों, दिल में डर सा छा जाता हैं,

तुम्हारे मुझे ना चाहने का पर मेरी कोई शिकायत नहीं हैं,

लेकिन मेरा तुम्हें चाहनां कोई गुनाह हैं, यह साबीत तो कर दों..

तुम्हारा मुझे न चाहने का कोई तो जवाब दे दों..

हरकतें तुम्हारी बडी़ तड़पाती हैं रात-दिन,

बडी़ ही मुश्कील से कट रहें हैं तुम्हारे बिना यह दिन…


You know what?

कितना दुःख होता हैं, तुम्हारी इन जिदों से,

बस भी करों यार यह लुका-छुपी अब,

आओ हाथ बढाओ और बस आँखे मूँदकर भरोसा करों,

ऐसा भरोसा आजमानें का मौका फिर कभी ना आयेगा…

बस साथ तुम्हारा मिले मुझे और तुम्हें मेरा, यही सलीखा रहें सदा बस उमर दें हम उसें… जीवनभर कामयाब रिश्ता बनानें की…


You know what?

एक कदम मैं पीछे भी लूँ तो मुझे कोई गम नहीं,

बस साथ रहें तू हमेशा यह बात किसी चिज से कम नहीं,

प्यार हो या दोस्ती, गिले-शिकवे हम क्यों रखे हमारे दरमियाँ?

बस उलझनों में मत रहना, वरना मंजिलें छूट जायेंगी..

हाथ बढाओ फिलहाल दोस्ती का, जब तुम्हे भी मुझसे प्यार होगा तब देखा जायेगा.. क्योंकी प्यार की कोई उम्र नहीं होती…


– © विवा

नातं प्रेमाचं…

​नातं प्रेमाचं…


एक एक दिवस ते मंद मंद फुलवायचं,

काटा जरी रूतला मनाला, तरी त्यातून सावरायचं,

कितीही विरोध झाला, तरी आपण नाही घाबरायचं,

तुझं-माझं तेच आपलं म्हणत रोज ते जगायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


रोज रोज नवं असं आपण काहीतरी शिकायचं,

दुखाच्या डोंगराला हळूच मागे सारायचं,

सुखाच्या क्षणांना दोघांनीही जाऊन बिलगायचं,

एकमेकांपासून कधी काहीच नाही लपवायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


अहंकाराला आपण जरा जास्तच दूर ठेवायचं,

जग काय म्हणतं ते आपण नाही बघायचं,

फुस्कारलेल्या चेहऱ्यांना तिथेच गप्प करायचं,

राग-माग सारख्या शब्दांना आपल्या शब्दकोशातूनच काढायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


दुर्गुणांचा नाश करून सद्गुणांना स्विकारायचं,

एकमेकांच्या चुकांना आपणच अलगद झेलायचं,

तशा चुका होऊ नयेत म्हणून जरा सावधच राहायचं,

हवं तिथं ओरडायचं, हक्काने रूसायचं, नि प्रेमाने हसायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


दोष-निर्दोष ह्यांना आयुष्यात कधीच नाही आणायचं,

प्रेमाच्या मोहक झऱ्याखाली आपण दोघांनीही निखळ नहायचं,

कितीही वाईट क्षण आले तरी अलिप्त कधीच नाही व्हायचं,

हातात हात घालून नेहमीच सोबत राहायचं, खंबीरपणे,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


प्रेमानंच नातं टिकतं हे दुनियेला दाखवून द्यायचं,

सत्याच्या शोधात आपण नेहमी खरं बोलायचं,

कपटी-त्रयस्थाना नगन्य स्थान द्यायचं,

प्रेमानं भरलेलं आपलं असं सुंदर घर बनवायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


सुखाच्या नाजूक वेलींवर सुंदर फुलांना फुलवायचं,

आपल्या दोघांच्या प्रेमाने त्यांना खूप खूप जपायचं,

चांगल्या विचारांचं बाळकडू त्यांना आपण पाजायचं,

बळ-बुध्दी च्या जोरावर त्यांना उंच झेपावू द्यायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


चंद्र-चांदण्यांसारखं त्यांना आपण जपायचं,

कधी ठेच लागलीच तर प्रेमानं एकमेकांना सावरायचं,

ऐकमेकांच्या दुखाचे कधीच कारण नाही बनायचं,

हर्ष-उल्हास असावेत घरात असं नेहमीच वागयचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं,


कुणालाही न दुखवता आपण सुखाच्या बागेत खेळायचं,

मेणबत्ती आणि धाग्यासारखं आयुष्य सोबतच घालवायचं,

जाता जाता चार डोळे तरी पाणावतील, असं काही जगायचं,

कुणीतरी आपली आठवण काढेल असं काम करायचं,

नातं प्रेमाचं आपण दोघांनीही जपायचं.

                                             –  © विवा

सिर्फ उन्हीं की यादों में..

​सिर्फ उन्हीं की यादों में..


किलकारियाँ गुँज उठी थी उन कुरबानियों की,

जिन्हें दुश्मन ने ललकारा था, द्रास की उन घाटीयों में।


छर्रों से कई जिंदगियाँ तबाह कि जा रही थी,

जिन्हें इस जमींं की माताओं ने सवाँरा था।


किसी का बिक्रम बत्रा था, तो किसी का अजीज था,

कोई हिंदू था, तो कोई मुस्लिम था,

सरहद पर मर मिटनेवाला हर एक खून हिंदुस्तानी था।


खून में लथपथ शरीरों ने कई जानें बचाई थी,

उनके घर पर उनकी बेवा खून के आँसू रोई थी।


बच्चे माँ को पूछ रहे थे, पापा घर कब आयेंगे?,

ढेर सारी मिठाईयाँ और हमें कपडे़-खिलौने कब दिलवाऐंगे?


बुजुर्ग माँ-बाप भी दिल से दुआ माँग रहे थे,

बुझदिल-ऐ-कायरों की भगवान से मौत माँग रहे थे।


सरहद पे मर मिटनेवालों का भी खून लाल ही था,

गोला-बारूद में मिलाकर उसे मिट्टी सा ढोया था।


फिर भी मजहब करते रहीं दुश्मन की वह टोलियाँ,

जंग जब छीड़ गयी तब बरसने लगी थी गोलियाँ।


खुशहालों के घरों में मातम सा फैलाया था,

खुशी थी जीत हासील होने की, फिर भी सन्नाटा छाया था।


खामोश हुई थी उनकी सिसकियाँ कश्मीर की उस घाटी में,

जहाँ आज भी हजारो दिये जलते हैं, सिर्फ उन्हीं की यादों में।

 

#कविता #माझीसखी

– © विवा

तू परत येशील का?

​शब्द नव्हते मन रितं करण्यासाठी, आसुसलेल्या भावनांनी मात्र डोळ्यांतून वाट काढली होती, तुला जाताना पाहून..

शेवटचा तुझा हसरा चेहरा, मला अजूनही आठवतोय..   तू अजूनही असल्याचा भास देतोय.. विरलेल्या शब्दांनाही अक्षरशः भिती वाटते आता, डोळ्यांतून ओघळणाऱ्या या आसवांची..

माणसांच्या या गर्दिमध्ये अडखळलेली माझी मलूल पावले मात्र, फक्त तुलाच शोधतायत आता, तुझ्या ह्या भासामुळे.. कारण तुझी खूप सवय झाली होती, गर्दीत हातात हात घेऊन सोबत चालण्याची.. तीच गर्दी आज नकोशी वाटत होती…

परवा तुझा वाढदिवस होता, घरी तुझी आठवण काढत होते सर्वचजण.. परंतु माझ्या भावना अजूनही डोळ्यांतून वाहत होत्या… मला शांत करता करता आईला सुध्दा खूप गहिवरून आलं होतं, फक्त तुझ्या आठवणी ने..

माझे डोळे पुसायला तिने पदर पुढे केला तर, आईने तू भेट दिलेली साडीच नेसली होती, आईचा हात तिथेच निश्चल झाला आणि तीलाही तिच्या भावना आवरता आल्या नाहीत..

तितक्यातच बाबांना कपाट साफ करताना माझ्या वाढदिवसाला तू भेट दिलेलं घड्याळ सापडलं, ते घेण्यासाठी मी पुढे सरसावलो, परंतु ते ही वेळ बरोबर नसल्याचं दाखवत होतं, त्या घड्याळातील वेळ आणि तारीख त्याच दिवसाची आठवण करून देत होतं, जेंव्हा आपण दोघं शेवटचं भेटलो होतो..

निरस आणि छळणाऱ्या या भावनांचां भार आता माझ्या मनाला ही सोसेनासा झालाय… काळजात बिलगून राहिलेल्या या तुझ्या सुख-दुखाच्या आठवणींचा खूप त्रास होतो अधूनमधून, भिंतीवर टांगलेली सजावट देखील तुझ्या कलेची साक्ष देतेय, त्या कलेलाही तू पोरकं का गं केलंस?

ऑफिस ला जाताना तू भेट दिलेला शर्ट मी घालण्याचा प्रयत्न केला, परंतु तो देखील आता खूपच दाटत होता, वेळ खूप सरून गेलीये याची जाणीव करून देत होता.. कित्ती काळजी घ्यायचीस तू आम्हा सर्वांची?

तू जेंव्हा घरी यायचीस, घरातील सर्व कामं तूच एकटी करायचीस, आईला कसलाही जाच न देता..  वर्षे लोटली तुझ्या हातचं जेवण खाऊन, तितकच चविष्ट, रूचकर आणि पौष्टिक, तुझी खासियतच होती ती…

शेवटचं आलिंगन ही खूपच अल्पकालीन होतं, तुला दूर करावं असं जराही वाटत नव्हतं.. पुढे चालत आलो, पाठीमागे वळून पाहिलं तर तुझा हसरा चेहराच दिसत होता.. परंतु नियतीला हे पटलं नव्हतं…

शोक अनावर होतो मला, आपोआपच पापण्या पाणावतात.. ओशाळलेल्या आठवणी कधी कधी हसवतात पण, जास्त रडवतात; सोबत फक्त तुझा फोटो आणि आठवणीच असतात आता…

काय करू ह्या जगात असा एकटाच, जरा मला तू सांगशील का? ह्या विक्षिप्त जगात असं वावरायला नकोसं वाटतंय आता, मोडून पडलेल्या आपल्या सुंदर स्वप्नांना सावरायला तू परत येशील का?

– © विवा

खेल..

​”प्यार प्यार में खेल खेल गयी वह,

इंतजार के नाम पे सिर्फ दर्द दे गयी वह,

खुद तो बड़ी शातीर निकली; उसकी झूठ़ी आहटों से,

मेरी खामोश नज़रें ढुँढती रही उसे मेरे खयालों के पन्नों में,

लेकिन पन्ने तो सारे फटें निकलें,

जिन्हें जिद्दोजहत उसने आजमाया था।”


– © विवा

बिछड़न

“सुकुन सा महसूस हुआ था उस दिन मुझे,

जिस दिन वह बोली थी मिलने आयेगी जरूर,

जिस दिन वक्त से मैंने पुछा, क्या था उसका कसूर; तो समझ में आया उसका मुझसे मिलन ही कुछ आधा-अधूरा था,

कंबख्त वक्त ने उसकी राह न देंखी, के ले गया वह उसे मेरे नसीब से छुडाकर,

बोली थी, डोली में सजधजकर आयेगी वह मेरे घर जरूर,

लेकीन, वक्त ने हि कुछ पल ऐसे लिखे थें मेरे नसीब में कि; बिच में “बिछड़न” आ बैठी।”

– © विवा

‘उन्हें’ भुला न सका..

“गमों को मैंने कोरे कागज पर उतारा था, लमहे गुजारे थे, बड़ी मुश्किल से उन्हें सँवारा था,

डुब रही थी नैया मेरे ऐतबार कि, न कोई किनारा था और ना ही कोई साथी।

बिछ़डे पलों से सँवरना सिख लिया था, उन गमों को भुलना भी सिख लिया था,

पर जज्बात ऐसे थे मेरे, कि ‘उन्हें’ मैं भूला न सका।”


– © विवा

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