आठवण…

​ती येते, ती छळते,
काहूर माजवते,

मनाच्या पटलावर,

कधी डोळ्यांत पाणी,

अन् भावनांध गाणी,

सूर तीचे उमटती आवेगाने,

मग अश्रू तरळती वेगाने,

अमर्याद, विस्तीर्ण अशी ती,

सांगे डोळ्यांस नजर भेदाया,

अ ते अतः पर्यंत,

जिथे फक्त तीच दिसे,

शब्द ही होती परके,

जेंव्हा जेंव्हा येते ती,

शब्दसूरांच्या मैफीलीत रंगणारी,

प्रितीची ती शाल जणू,

अन् किनार लांब तिजला,

शब्दांच्या नाजूक माळांची,

मोहरणाऱ्या या मनावर,

ती एक कवडसा जणू,

सोनेरी किरणांचा,

धारधार पिवळ्या रेषांचा,

कधी हवीहवीशी,

कधी भयप्रद, भयानक,

कधी शब्दांचे गंध टिपते,

कधी कवेत घेते,

कधी भ्रमाला चपराक,

अन् कधी शस्त्राची धार,

शुभ्र फुलांचा सुगंध जणू,

कधी असते उध्वस्त,

कधी असते उजळणी,

आयुष्यात मरेपर्यंत ती साथ देते,

चांगले वाईट अनुभव देते,

लोकांची पारख देते,

स्वतः ची ओळख देते

कधी डोळ्यांतून वाहते,

कधी मंद मंद हसते,

अन् गालावरच्या या खळीला,

हसण्याचे कारण देते,

ती एक आठवण,

मनातली साठवण,

अन् अचानक सुचते,

ही कविता.. ती एक आठवण…


विवा ©

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सिर्फ उन्हीं की यादों में..

​सिर्फ उन्हीं की यादों में..


किलकारियाँ गुँज उठी थी उन कुरबानियों की,

जिन्हें दुश्मन ने ललकारा था, द्रास की उन घाटीयों में।


छर्रों से कई जिंदगियाँ तबाह कि जा रही थी,

जिन्हें इस जमींं की माताओं ने सवाँरा था।


किसी का बिक्रम बत्रा था, तो किसी का अजीज था,

कोई हिंदू था, तो कोई मुस्लिम था,

सरहद पर मर मिटनेवाला हर एक खून हिंदुस्तानी था।


खून में लथपथ शरीरों ने कई जानें बचाई थी,

उनके घर पर उनकी बेवा खून के आँसू रोई थी।


बच्चे माँ को पूछ रहे थे, पापा घर कब आयेंगे?,

ढेर सारी मिठाईयाँ और हमें कपडे़-खिलौने कब दिलवाऐंगे?


बुजुर्ग माँ-बाप भी दिल से दुआ माँग रहे थे,

बुझदिल-ऐ-कायरों की भगवान से मौत माँग रहे थे।


सरहद पे मर मिटनेवालों का भी खून लाल ही था,

गोला-बारूद में मिलाकर उसे मिट्टी सा ढोया था।


फिर भी मजहब करते रहीं दुश्मन की वह टोलियाँ,

जंग जब छीड़ गयी तब बरसने लगी थी गोलियाँ।


खुशहालों के घरों में मातम सा फैलाया था,

खुशी थी जीत हासील होने की, फिर भी सन्नाटा छाया था।


खामोश हुई थी उनकी सिसकियाँ कश्मीर की उस घाटी में,

जहाँ आज भी हजारो दिये जलते हैं, सिर्फ उन्हीं की यादों में।

 

#कविता #माझीसखी

– © विवा

खेल..

​”प्यार प्यार में खेल खेल गयी वह,

इंतजार के नाम पे सिर्फ दर्द दे गयी वह,

खुद तो बड़ी शातीर निकली; उसकी झूठ़ी आहटों से,

मेरी खामोश नज़रें ढुँढती रही उसे मेरे खयालों के पन्नों में,

लेकिन पन्ने तो सारे फटें निकलें,

जिन्हें जिद्दोजहत उसने आजमाया था।”


– © विवा

बिछड़न

“सुकुन सा महसूस हुआ था उस दिन मुझे,

जिस दिन वह बोली थी मिलने आयेगी जरूर,

जिस दिन वक्त से मैंने पुछा, क्या था उसका कसूर; तो समझ में आया उसका मुझसे मिलन ही कुछ आधा-अधूरा था,

कंबख्त वक्त ने उसकी राह न देंखी, के ले गया वह उसे मेरे नसीब से छुडाकर,

बोली थी, डोली में सजधजकर आयेगी वह मेरे घर जरूर,

लेकीन, वक्त ने हि कुछ पल ऐसे लिखे थें मेरे नसीब में कि; बिच में “बिछड़न” आ बैठी।”

– © विवा

‘उन्हें’ भुला न सका..

“गमों को मैंने कोरे कागज पर उतारा था, लमहे गुजारे थे, बड़ी मुश्किल से उन्हें सँवारा था,

डुब रही थी नैया मेरे ऐतबार कि, न कोई किनारा था और ना ही कोई साथी।

बिछ़डे पलों से सँवरना सिख लिया था, उन गमों को भुलना भी सिख लिया था,

पर जज्बात ऐसे थे मेरे, कि ‘उन्हें’ मैं भूला न सका।”


– © विवा

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