सिर्फ उन्हीं की यादों में..

​सिर्फ उन्हीं की यादों में..


किलकारियाँ गुँज उठी थी उन कुरबानियों की,

जिन्हें दुश्मन ने ललकारा था, द्रास की उन घाटीयों में।


छर्रों से कई जिंदगियाँ तबाह कि जा रही थी,

जिन्हें इस जमींं की माताओं ने सवाँरा था।


किसी का बिक्रम बत्रा था, तो किसी का अजीज था,

कोई हिंदू था, तो कोई मुस्लिम था,

सरहद पर मर मिटनेवाला हर एक खून हिंदुस्तानी था।


खून में लथपथ शरीरों ने कई जानें बचाई थी,

उनके घर पर उनकी बेवा खून के आँसू रोई थी।


बच्चे माँ को पूछ रहे थे, पापा घर कब आयेंगे?,

ढेर सारी मिठाईयाँ और हमें कपडे़-खिलौने कब दिलवाऐंगे?


बुजुर्ग माँ-बाप भी दिल से दुआ माँग रहे थे,

बुझदिल-ऐ-कायरों की भगवान से मौत माँग रहे थे।


सरहद पे मर मिटनेवालों का भी खून लाल ही था,

गोला-बारूद में मिलाकर उसे मिट्टी सा ढोया था।


फिर भी मजहब करते रहीं दुश्मन की वह टोलियाँ,

जंग जब छीड़ गयी तब बरसने लगी थी गोलियाँ।


खुशहालों के घरों में मातम सा फैलाया था,

खुशी थी जीत हासील होने की, फिर भी सन्नाटा छाया था।


खामोश हुई थी उनकी सिसकियाँ कश्मीर की उस घाटी में,

जहाँ आज भी हजारो दिये जलते हैं, सिर्फ उन्हीं की यादों में।

 

#कविता #माझीसखी

पाहुणा©